हनु

उन आँखों से छलकती चमक
उस चेहरे पे फेली हुई दमक

खुले बिखरे घुंघराले वो बाल
दर्शाते मस्ती में बीते तीन साल

इतराते, बल खाते, ठुमकते पग
ज्यों मौज दौड रही हो रग-रग

वो स्नेहयुक्त उन्मुक्त आलिंगन
वो प्रेमसिक्त मीठा-सा चुंबन

पापा की गाडी की संभाले कमान
बडा होने का वो झूठा गुमान

छोटे होने का प्यारा सा स्वांग
कि 'गोदी ले लो' की कर सके माँग

'उथो' कहती वो तोतली सी भाषा
'ए फोल' में छिपी भविष्यत् आशा

संपूर्ण बचपन का साकार आद्यांत
याद कर जिसे चित्त हो जाए प्रशांत

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