काश !

क्या पू़छा था युधिष्ठिर से किसी ने
ओ धर्मराज अति बलवान,
हे भारत के विजयी महान
क्या क्षणिक मुस्कान भी कबी
तुम्हारे होठों पे आई थी?
विजयी कुरु की रक्तिम भूमि
क्या फिर तुम्हे कभी भाई थी?

क्या उल्लसित हुए थे तुम
जीत पूरे भारत का दाँव?
क्या घृत-दीप प्रज्ज्वलित हुए
भारत के किसी एक भी गाँव?

उत्तर ज्ञात मुझे इन प्रश्नों का
मुझे एक शब्द में होता है - 'काश!'

काश किसी कुरू का परिणाम कभी
मुस्कान लेके भी आता !
काश पार्थ का अंतिम शर कभी
संदेशे खुशियों के भी लाता !

पर, रण के ङर पर्व की इति
कर्णों के शवों पे होती है
और अभागी विक्षिप्त पृथाएँ
उन लाशों पे रोती हैं

झूठी शान और लिप्सा की खातिर
हंम अश्रु मोल क्यों लेते हैं?
कुरु से या खाडी से कभी
हम शिक्षा क्यों ना लेते हैं?

काश पढ़ने की जगह
इतिहास हमने समझा होता - काश !

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