कंक्रीट का जंगल
एक जंगल है यहाँ
पर यहाँ पेड़ नहीं हैं
ना पौधे,
ना कंटीली झाड़ियाँ
या उलझती लताएँ ही ।
पर एक दलदल है
जो नहीं बना है गर्द से
पानी या पंक से
इसका सृजन हुआ है -
कहीं मजबूत कंक्रीट से,
सिमेंट, पत्थर और ईंट से ।
मिट्टी के बने दलदल से
निकलना आसान है,
बस चाहिए -
एक मजबूत लता और
उस पार खड़ा कोई,
जो अड़िग हो,
कटिबद्ध हो,
और हो तत्पर।
पर यहाँ लताएँ नहीं दीखती,
और कंक्रीट की दीवार के पार
कोई खड़ा ना हो शायद
या हो भी तो
उसकी आवाज़ नहीं आती।
शायद वह भी चुप है
अड़िग ना सही,
कटिबद्ध तो है,
तत्पर तो है
पर चुप है।
या शायद बोल रहा है
वह, पर,
कंक्रीट के पार आवाज,
बड़ी क्षीण-सी आती है,
अगर सुन सको तो।।
Post new comment