पहली बूँद
वैशाख की तपती संध्या में
गिरी पहली बूँद बारिश की
यों, मिल गई खाक में जब,
उत्तर में धरा ने अपनी सुगंध
उडे़ल दी हवा में मंद मंद
कि चल पडा समीर त्रिविध बन ।
ऐसे में एक थका तन
पाकर बूँदों की फुहार,
स्पर्श करती बयार और
धरती का सुगंधित प्यार
हो उठा प्रफुल्लित कि जैसे
कर लिया हो प्रेयसी ने आलिंगन-बद्ध ।
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