बादल से बातचीत

आह क्या दृश्य मनोरम था
पेड़-पौधों से भरी धरा
बीच में तड़ाग जल-भरा
उस पार थे पर्वत-शृंग अनेक
और छोटी-पतली पगडंडी एक
जो जाती हो शायद शिखर
पार कर नदी जो बहती निर्झर ।

ऊपर स्पष्ट-सरल-सपाट ख को
धरा से मिलाने को आतुर
वेगमय चल रहा था मारूत ।

उस वायु-वेग पे हो सवार
आ गए घने तुम, हे घनराज
नीला फैला था जो नभ विशाल
चारो तरफ हो एकाकार
किया उसे श्वेत-श्याम वर्ण
खींच दी उसपे रेखाएँ अनंत
कल्पित नाना रूप फिर धरकर
प्रकट किये तुमने बिम्ब प्रखर
वो गरूढ़,
वो ऐरावत है
अरे वो तो साक्षात् हनुमंत है।

वृष्टि-अनावृष्टि की छोड़ो तुम
बरसो ना बरसो तुम्हारा मन है
कि शीतलता तुम्हारी ही लाती
एक स्मिता सघन है
और कराती आश्वस्त कि
ऊपर नहीं सब नभ-सम
एकरस-नीरस है
बहुरूप धरे भी कोई रहता है
जो बालरूप-सा खेल रचता है।

पर जब आओ तुम
अगली बार हे वारिद
लाना इंद्रधनुष, संग अपने
एक प्रतीक मानिंद
कि बच्चे खुश हों
बजाएँ ताली
और बड़े मानें कि
नहीं हुआ स्वर्ग
शुष्क और खाली ।

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