कल और आज
भरी दोपहर में होती बारिश देख
याद आ गए वो दिन जब
गिरते वारि-बूँदों की आवाज सुन ही
मचल उठते थे पाँव
दौड कर आना आँगन में
तीब्र हवा और तेज जल-धार बीच
अनसुनी करना वो डाँट जो अनर्थक
माँ की मुस्कान छिपाने का प्रयास करते
बस भींगना, भींगना और भींगते रह जाना
जल के भार से सिक्त
शरीर से चिपके कपडे और
नंगे पाँव के नीचे जल की धार।
मुख खोलकर पीना स्वर्ग का प्रसाद
और थिरकते पाँव से करना प्रमाद।
फिर जब इंद्र दिखला दें झलक
क्षितिज पे सतरंगी अपने धनुष की
सर पौंछते हुए माँ की झुठी
झिडकी सुन, भोली आँखों से पूछना
“एक प्याली चाय मिलेगी ?”
और आज….
आज बस वातायन से उस पार
बूदों को गिरते देखता हूँ
और झूमते पेडों पे नजर डाल,
मुस्का कर एक कविता लिख लेता हूँ।
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