मन रे तू आस ना खोना
मन रे तू आस ना खोना ।
पथ कंकरीले भी आते हैं,
पग में कंकड चुभ जाते हैं,
लहूलहान हों पाँव अगर भी,
हे पथिक, विश्वास ना खोना।
मन रे तू आस ना खोना ।।
छिप जाए जब तम में दिनकर,
ना करता सूचित वह प्रलय को
कहता जयद्रथ-वध निकट है
सो धनंजय, तू सांस ना खोना ।
मन रे तू आस ना खोना ।।
गगन में जब भी छाए मेघ
और छाई धरा पे अंधियारी
वनों में तब ही नाचे मोर
और आई खेतों में हरियाली
ऐसे में ऐ हलधर, प्रयास ना खोना ।
मन रे तू आस ना खोना ।।
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